प्राचीन इतिहास का विभाजन (Ancient History Division) – एक पंक्ति में
- प्रागैतिहासिक काल (Pre-Historic Period) – वह काल जब लिखित अभिलेख उपलब्ध नहीं थे।
- पुरापाषाण काल (Palaeolithic Age) – मानव पत्थर के औजारों का उपयोग करता था।
- निम्न/प्रारम्भिक पुरापाषाण काल (Lower Palaeolithic) – मानव जीवन का प्रारम्भिक शिकारी-संग्रहकर्ता चरण।
- मध्य पुरापाषाण काल (Middle Palaeolithic) – अधिक विकसित पत्थर के औजारों का प्रयोग हुआ।
- उच्च पुरापाषाण काल (Upper Palaeolithic) – कला एवं गुफा चित्रों का विकास हुआ।
- मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age) – सूक्ष्म पत्थर के औजार (Microliths) का प्रयोग प्रारम्भ हुआ।
- नवपाषाण काल (Neolithic Age) – कृषि, पशुपालन, अग्नि और पहिए का विकास हुआ।
- आद्य-ऐतिहासिक काल (Proto-Historic Period) – लिखित प्रमाण सीमित एवं अपठित अवस्था में मिले।
- सिंधु घाटी सभ्यता (2600–1700 ई.पू.) – कांस्य युग की विकसित नगरीय सभ्यता।
- वैदिक सभ्यता – आर्यों के आगमन के बाद विकसित भारतीय सभ्यता।
- ऋग्वैदिक काल (1500–1000 ई.पू.) – वैदिक सभ्यता का प्रारम्भिक चरण।
- उत्तर वैदिक काल (1000–600 ई.पू.) – कृषि, राज्य और सामाजिक व्यवस्था का विस्तार हुआ।
- ऐतिहासिक काल (Historical Period) – लिखित अभिलेखों के आधार पर ज्ञात इतिहास।
- प्राचीन भारत का इतिहास – प्रारम्भिक सभ्यताओं से गुप्तकाल तक का इतिहास।
- मध्यकालीन भारत का इतिहास – लगभग 8वीं से 18वीं शताब्दी तक का इतिहास।
- आधुनिक भारत का इतिहास – यूरोपीय आगमन से स्वतंत्रता तक का इतिहास।
प्रमुख पुरातात्विक स्थल एवं खोजें (One Liners)
- भीमबेटका (पुरापाषाण काल) – गुफा चित्रों के लिए प्रसिद्ध।
- सराय नाहर राय, महदाहा (मध्यपाषाण काल) – मानव कंकाल के अवशेष प्राप्त हुए।
- चोपानी माण्डो (मध्यपाषाण काल) – चावल और मिट्टी के बर्तनों के प्रमाण मिले।
- आदमगढ़, बागोर (मध्यपाषाण काल) – पशुपालन के प्रारम्भिक प्रमाण मिले।
- कोल्डीहवा (नवपाषाण काल) – चावल की खेती के सबसे प्राचीन प्रमाण मिले।
- बुर्जहोम (नवपाषाण काल) – मानव और कुत्ते का संयुक्त दफन मिला।
- चिरांद (नवपाषाण काल) – हिरण के सींगों से बने औजार प्राप्त हुए।
- पिकलीहल एवं उत्तनूर (नवपाषाण काल) – राख के टीले (Ash Mounds) मिले।
सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल – एक पंक्ति में
- हड़प्पा (पंजाब, पाकिस्तान) – दयाराम साहनी द्वारा 1921 में खोजा गया; विशाल अन्नागार, कब्र R-37 तथा नृत्य मुद्रा वाला धड़ मिला।
- मोहनजोदड़ो (सिंध, पाकिस्तान) – आर. डी. बनर्जी द्वारा 1922 में खोजा गया; महान स्नानागार, कांस्य नर्तकी तथा पशुपति मुहर के लिए प्रसिद्ध।
- लोथल (अहमदाबाद, गुजरात) – एस. आर. राव द्वारा 1955 में खोजा गया; गोदीवाड़ा (Dockyard), मनका उद्योग तथा हाथीदांत पैमाना मिला।
- धौलावीरा (कच्छ, गुजरात) – आर. एस. बिष्ट एवं जे. पी. जोशी द्वारा खोजा गया; जल प्रबंधन प्रणाली और 10 प्रतीकों वाला शिलालेख मिला।
- कालीबंगन (हनुमानगढ़, राजस्थान) – बी. बी. लाल एवं बी. के. थापड़ द्वारा 1961 में खोजा गया; जुते हुए खेत और भूकम्प के प्रमाण मिले।
- राखीगढ़ी (हिसार, हरियाणा) – भारत का सबसे बड़ा हड़प्पा स्थल; टेराकोटा पहिया और खिलौने प्राप्त हुए।
- बनावली (फतेहाबाद, हरियाणा) – आर. एस. बिष्ट द्वारा खोजा गया; मिट्टी के हल का नमूना प्राप्त हुआ।
- रोपड़ (पंजाब) – यज्ञदत्त शर्मा द्वारा खोजा गया; कुत्ते के साथ मानव दफनाने के प्रमाण मिले।
SSC/Railway One-Liners
- हड़प्पा की खोज – दयाराम साहनी (1921)
- मोहनजोदड़ो की खोज – आर. डी. बनर्जी (1922)
- लोथल की खोज – एस. आर. राव (1955)
- धौलावीरा की खोज – आर. एस. बिष्ट
- कालीबंगन की खोज – बी. बी. लाल एवं बी. के. थापड़
- भारत का सबसे बड़ा हड़प्पा स्थल – राखीगढ़ी
- गोदीवाड़ा (Dockyard) वाला स्थल – लोथल
- महान स्नानागार वाला स्थल – मोहनजोदड़ो
- जुते हुए खेत का प्रमाण – कालीबंगन
- उन्नत जल प्रबंधन प्रणाली – धौलावीरा
- कुत्ते के साथ दफनाने का प्रमाण – रोपड़
- टेराकोटा पहिया प्राप्त स्थल – राखीगढ़ी
- मिट्टी के हल का प्रमाण – बनावली
- विशाल अन्नागार के लिए प्रसिद्ध स्थल – हड़प्पा
- कांस्य नर्तकी की मूर्ति प्राप्त स्थल – मोहनजोदड़ो
सिंधु घाटी सभ्यता में आयातित वस्तुएँ – एक पंक्ति में
- चाँदी (Silver) – राजस्थान के जावर-अजमेर, अफगानिस्तान और ईरान से आयात की जाती थी।
- टिन (Tin) – मध्य एशिया, ईरान और अफगानिस्तान से प्राप्त किया जाता था।
- फ़िरोज़ा (Turquoise) – ईरान से आयात किया जाता था।
- लाजवर्द (Lapis Lazuli) – बदख्शां (अफगानिस्तान) और मेसोपोटामिया से लाया जाता था।
- ताँबा (Copper) – राजस्थान के खेतड़ी तथा बलूचिस्तान से प्राप्त किया जाता था।
- सीसा (Lead) – दक्षिण भारत, अफगानिस्तान, ईरान और राजस्थान से प्राप्त होता था।
- गोमेद (Hessonite Garnet) – सौराष्ट्र (गुजरात) से प्राप्त होता था।
सिंधु घाटी सभ्यता के नगर एवं नदियाँ – एक पंक्ति में
- हड़प्पा – रावी नदी के तट पर स्थित था।
- मोहनजोदड़ो – सिंधु नदी के तट पर स्थित था।
- कालीबंगन – घग्घर नदी के तट पर स्थित था।
- लोथल – भोगावा नदी के तट पर स्थित था।
- राखीगढ़ी – घग्घर नदी के तट पर स्थित था।
- बनावली – प्राचीन सरस्वती नदी के तट पर स्थित था।
- कोट दीजी – सिंधु नदी के तट पर स्थित था।
- दायमाबाद – प्रवरा नदी के तट पर स्थित था।
- सुतकोटा कोह – शादी कौर नदी के तट पर स्थित था।
- आलमगीरपुर – हिंडन नदी के तट पर स्थित था।
- अमरी – सिंधु नदी के तट पर स्थित था।
- भगवानपुरा – सरस्वती नदी के तट पर स्थित था।
- कुनाल – सिंधु नदी के तट पर स्थित था।
- चन्हूदड़ो – सिंधु नदी के तट पर स्थित था।
- मांडा – चिनाब नदी के तट पर स्थित था।
- रोपड़ – सतलुज नदी के तट पर स्थित था।
- रंगपुर – मदार नदी के तट पर स्थित था।
- सुत्कागेंडोर – दाश्क नदी के तट पर स्थित था।
SSC/Railway Quick Revision
- लाजवर्द का प्रमुख स्रोत – बदख्शां (अफगानिस्तान)
- ताँबे का प्रमुख स्रोत – खेतड़ी (राजस्थान)
- फ़िरोज़ा कहाँ से आता था? – ईरान
- लोथल किस नदी पर था? – भोगावा
- मोहनजोदड़ो किस नदी पर था? – सिंधु
- हड़प्पा किस नदी पर था? – रावी
- कालीबंगन किस नदी पर था? – घग्घर
- रोपड़ किस नदी पर था? – सतलुज
- आलमगीरपुर किस नदी पर था? – हिंडन
- मांडा किस नदी पर था? – चिनाब
- सुत्कागेंडोर किस नदी पर था? – दाश्क
- बनावली किस नदी पर था? – प्राचीन सरस्वती।
वैदिक काल (Vedic Period) – एक पंक्ति में
- वैदिक आर्यों की भाषा – संस्कृत थी।
- वेदों की कुल संख्या – चार है।
- वेदों का संकलन – महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने किया।
- वेद अपौरुषेय हैं – अर्थात मनुष्य द्वारा रचित नहीं, ईश्वर प्रदत्त माने जाते हैं।
- वेद प्रारम्भ में – श्रुति परंपरा द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाए गए।
- सबसे प्राचीन वेद – ऋग्वेद है।
- ऋग्वेद में मंडलों की संख्या – 10 है।
- ऋग्वेद के सबसे प्राचीन मंडल – द्वितीय से सप्तम मंडल हैं।
- ऋग्वेद का दसवाँ मंडल – पुरुष सूक्त का उल्लेख करता है।
- बोगाज़कोई अभिलेख में वर्णित वैदिक देवता – इन्द्र, वरुण, मित्र और नासत्य हैं।
- ऋग्वैदिक काल के प्रमुख देवता – इन्द्र और अग्नि थे।
- ऋग्वेद में इन्द्र का उल्लेख – लगभग 250 सूक्तों में मिलता है।
- ऋग्वेद में अग्नि का उल्लेख – लगभग 200 सूक्तों में मिलता है।
चार वेद – एक पंक्ति में
ऋग्वेद (Rigveda)
- उपवेद – आयुर्वेद।
- ऋत्विज (पुरोहित) – होतृ (Hotri)।
- विषयवस्तु – ऋचाओं (स्तुतियों) का संकलन।
- सबसे प्राचीन वेद – ऋग्वेद।
यजुर्वेद (Yajurveda)
- उपवेद – धनुर्वेद।
- ऋत्विज (पुरोहित) – अध्वर्यु (Adhvaryu)।
- विषयवस्तु – यज्ञ एवं कर्मकाण्ड संबंधी मंत्र।
सामवेद (Samaveda)
- उपवेद – गंधर्ववेद।
- ऋत्विज (पुरोहित) – उद्गाता (Udgatri)।
- विषयवस्तु – गायन एवं संगीत संबंधी मंत्र।
- भारतीय संगीत का आधार – सामवेद को माना जाता है।
अथर्ववेद (Atharvaveda)
- उपवेद – शिल्पवेद।
- ऋत्विज (पुरोहित) – ब्रह्मा।
- विषयवस्तु – तंत्र-मंत्र, रोग निवारण एवं लोकजीवन संबंधी विषय।
SSC/Railway Quick Revision
- सबसे प्राचीन वेद – ऋग्वेद।
- संगीत का वेद – सामवेद।
- चिकित्सा का उपवेद – आयुर्वेद।
- युद्धकला का उपवेद – धनुर्वेद।
- संगीत का उपवेद – गंधर्ववेद।
- शिल्पकला का उपवेद – शिल्पवेद।
- ऋग्वेद के पुरोहित – होतृ।
- यजुर्वेद के पुरोहित – अध्वर्यु।
- सामवेद के पुरोहित – उद्गाता।
- अथर्ववेद के पुरोहित – ब्रह्मा।
- वेदों के संकलनकर्ता – वेदव्यास।
- ऋग्वेद में मंडल – 10।
- ऋग्वेद के प्रमुख देवता – इन्द्र एवं अग्नि।
ऋग्वेद के मंडल (Mandalas of Rigveda) – एक पंक्ति में
प्रथम मंडल
- ऋषि – मधुच्छंद, मेधातिथि गौतम आदि।
- विशेषता – अग्नि और इन्द्र देवता की स्तुतियाँ।
द्वितीय मंडल
- ऋषि – गृत्समद।
- विशेषता – अग्नि एवं इन्द्र की स्तुतियाँ।
तृतीय मंडल
- ऋषि – विश्वामित्र।
- विशेषता – प्रसिद्ध गायत्री मंत्र का उल्लेख मिलता है।
चतुर्थ मंडल
- ऋषि – वामदेव।
- विशेषता – कृषि संबंधी मंत्रों का वर्णन मिलता है।
पंचम मंडल
- ऋषि – अत्रि।
- विशेषता – सोम देवता की स्तुतियाँ मिलती हैं।
षष्ठ मंडल
- ऋषि – भारद्वाज।
- विशेषता – अग्नि एवं सोम देवता की स्तुतियाँ मिलती हैं।
सप्तम मंडल
- ऋषि – वशिष्ठ।
- विशेषता – दशराज्ञ युद्ध (Battle of Ten Kings) का वर्णन मिलता है।
अष्टम मंडल
- ऋषि – कण्व एवं अंगिरस।
- विशेषता – विभिन्न देवताओं की स्तुतियाँ मिलती हैं।
नवम मंडल
- ऋषि – विभिन्न ऋषि।
- विशेषता – सोम मंडल के नाम से प्रसिद्ध है।
दशम मंडल
- ऋषि – विमद, इन्द्र, शची आदि।
- विशेषता – पुरुष सूक्त का वर्णन मिलता है।
SSC/Railway Quick Revision
- गायत्री मंत्र – तृतीय मंडल (विश्वामित्र)।
- दशराज्ञ युद्ध – सप्तम मंडल (वशिष्ठ)।
- सोम मंडल – नवम मंडल।
- पुरुष सूक्त – दशम मंडल।
- कृषि संबंधी मंत्र – चतुर्थ मंडल।
- गृत्समद – द्वितीय मंडल।
- विश्वामित्र – तृतीय मंडल।
- वामदेव – चतुर्थ मंडल।
- अत्रि – पंचम मंडल।
- भारद्वाज – षष्ठ मंडल।
- वशिष्ठ – सप्तम मंडल।
- कण्व एवं अंगिरस – अष्टम मंडल।
वेदों की शाखाएँ, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद – एक पंक्ति में
ऋग्वेद (Rigveda)
- ऋग्वेद की प्रमुख शाखाएँ – शांखायन (कौषीतकि) एवं ऐतरेय हैं।
- ऋग्वेद का ब्राह्मण ग्रंथ – ऐतरेय ब्राह्मण और कौषीतकि ब्राह्मण हैं।
- ऋग्वेद का आरण्यक – ऐतरेय आरण्यक और कौषीतकि आरण्यक हैं।
- ऋग्वेद के उपनिषद – ऐतरेय उपनिषद और कौषीतकि उपनिषद हैं।
- ऐतरेय ब्राह्मण – राजसूय यज्ञ तथा सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग का वर्णन करता है।
यजुर्वेद (Yajurveda)
कृष्ण यजुर्वेद
- कृष्ण यजुर्वेद की शाखाएँ – काठक, कपिष्ठल, मैत्रायणी एवं तैत्तिरीय हैं।
- कृष्ण यजुर्वेद का ब्राह्मण – तैत्तिरीय ब्राह्मण है।
- कृष्ण यजुर्वेद का आरण्यक – तैत्तिरीय एवं मैत्रायणी आरण्यक हैं।
- कृष्ण यजुर्वेद के उपनिषद – तैत्तिरीय, मैत्रायणी, श्वेताश्वतर एवं कठोपनिषद हैं।
शुक्ल यजुर्वेद
- शुक्ल यजुर्वेद की शाखाएँ – काण्व और माध्यंदिन हैं।
- शुक्ल यजुर्वेद का ब्राह्मण – शतपथ ब्राह्मण है।
- शुक्ल यजुर्वेद का आरण्यक – बृहदारण्यक है।
- शुक्ल यजुर्वेद के उपनिषद – ईशोपनिषद एवं बृहदारण्यक उपनिषद हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
- "तमसो मा ज्योतिर्गमय" – बृहदारण्यक उपनिषद से लिया गया है।
- याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी संवाद – शतपथ ब्राह्मण में मिलता है।
- याज्ञवल्क्य और गार्गी संवाद – बृहदारण्यक उपनिषद में वर्णित है।
- नचिकेता और यमराज संवाद – कठोपनिषद में मिलता है।
- तैत्तिरीय उपनिषद – महिलाओं को यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार बताता है।
सामवेद (Samaveda)
- सामवेद की शाखाएँ – कौथुम, राणायनीय और जैमिनीय हैं।
- सामवेद के ब्राह्मण ग्रंथ – पंचविंश, छांदोग्य, जैमिनीय एवं सद्विंश ब्राह्मण हैं।
- सामवेद के आरण्यक – छांदोग्य एवं जैमिनीय आरण्यक हैं।
- सामवेद के उपनिषद – छांदोग्य उपनिषद एवं केन उपनिषद हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
- छांदोग्य उपनिषद – सबसे प्राचीन उपनिषद माना जाता है।
- "कृष्ण" शब्द का प्रथम उल्लेख – छांदोग्य उपनिषद में मिलता है।
- सत्यकाम जाबाल की कथा – छांदोग्य उपनिषद में वर्णित है।
- उद्दालक अरुणि एवं श्वेतकेतु संवाद – छांदोग्य उपनिषद में मिलता है।
- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ एवं वानप्रस्थ आश्रम – छांदोग्य उपनिषद में वर्णित हैं।
अथर्ववेद (Atharvaveda)
- अथर्ववेद की शाखाएँ – शौनक एवं पैप्पलाद हैं।
- अथर्ववेद का ब्राह्मण – गोपथ ब्राह्मण है।
- अथर्ववेद के प्रमुख उपनिषद – मुण्डक, माण्डूक्य एवं प्रश्न उपनिषद हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
- "सत्यमेव जयते" – मुण्डक उपनिषद से लिया गया है।
- सबसे छोटा उपनिषद – माण्डूक्य उपनिषद है।
SSC/Railway Quick Revision
- सत्यमेव जयते – मुण्डक उपनिषद।
- तमसो मा ज्योतिर्गमय – बृहदारण्यक उपनिषद।
- नचिकेता–यम संवाद – कठोपनिषद।
- याज्ञवल्क्य–गार्गी संवाद – बृहदारण्यक उपनिषद।
- याज्ञवल्क्य–मैत्रेयी संवाद – शतपथ ब्राह्मण।
- सबसे प्राचीन उपनिषद – छांदोग्य उपनिषद।
- सबसे छोटा उपनिषद – माण्डूक्य उपनिषद।
- कृष्ण शब्द का प्रथम उल्लेख – छांदोग्य उपनिषद।
- सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर, कलियुग का वर्णन – ऐतरेय ब्राह्मण।
- शतपथ ब्राह्मण – शुक्ल यजुर्वेद से संबंधित।
- गोपथ ब्राह्मण – अथर्ववेद से संबंधित।
ऋग्वैदिक काल की नदियाँ – एक पंक्ति में
- वितस्ता – वर्तमान झेलम नदी।
- असिक्नी – वर्तमान चिनाब नदी।
- परुष्णी – वर्तमान रावी नदी।
- विपाशा – वर्तमान ब्यास नदी।
- शुतुद्रि – वर्तमान सतलुज नदी।
- सुवास्तु – वर्तमान स्वात नदी।
- सदानीरा – वर्तमान गंडक नदी।
- कुभा – वर्तमान काबुल नदी।
- क्रमु – वर्तमान कुर्रम नदी।
- गोमती – वर्तमान गोमल नदी।
- दृषद्वती – वर्तमान घग्घर नदी।
- सिंधु – वर्तमान इंडस (Indus) नदी।
16 संस्कार (षोडश संस्कार) – एक पंक्ति में
- गर्भाधान – संतान प्राप्ति की कामना हेतु किया जाने वाला संस्कार।
- पुंसवन – गर्भस्थ शिशु के कल्याण हेतु किया जाने वाला संस्कार।
- सीमन्तोन्नयन – गर्भवती स्त्री की सुरक्षा एवं मंगल हेतु संस्कार।
- जातकर्म – शिशु के जन्म के तुरंत बाद किया जाने वाला संस्कार।
- नामकरण – शिशु का नाम रखने का संस्कार।
- निष्क्रमण – शिशु को पहली बार घर से बाहर ले जाने का संस्कार।
- अन्नप्राशन – शिशु को पहली बार अन्न खिलाने का संस्कार।
- चूड़ाकर्म (मुंडन) – बालों के प्रथम मुंडन का संस्कार।
- कर्णवेध – कान छेदन का संस्कार।
- विद्यारम्भ – शिक्षा प्रारम्भ करने का संस्कार।
- उपनयन – यज्ञोपवीत धारण कर शिक्षा ग्रहण करने का संस्कार।
- वेदारम्भ – वेदों के अध्ययन का संस्कार।
- केशान्त – शिक्षा काल में प्रथम दाढ़ी-मूंछ कटवाने का संस्कार।
- समावर्तन – गुरुकुल शिक्षा पूर्ण होने का संस्कार।
- विवाह – गृहस्थ जीवन में प्रवेश का संस्कार।
- अन्त्येष्टि – मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार।
हिन्दू विवाह के आठ प्रकार – एक पंक्ति में
- ब्रह्म विवाह – योग्य वर को कन्या का दान करना।
- दैव विवाह – यज्ञ करने वाले पुरोहित को कन्या देना।
- आर्ष विवाह – गौ एवं बैल लेकर कन्या का विवाह करना।
- प्राजापत्य विवाह – धर्म पालन की प्रतिज्ञा के साथ विवाह।
- असुर विवाह – कन्या के बदले धन देकर विवाह करना।
- गान्धर्व विवाह – प्रेम विवाह।
- राक्षस विवाह – बलपूर्वक कन्या का हरण कर विवाह करना।
- पैशाच विवाह – छल या अचेत अवस्था में विवाह करना।
SSC/Railway Quick Revision
- दशराज्ञ युद्ध किस नदी के तट पर हुआ? – परुष्णी (रावी)।
- वितस्ता का आधुनिक नाम – झेलम।
- असिक्नी का आधुनिक नाम – चिनाब।
- विपाशा का आधुनिक नाम – ब्यास।
- शुतुद्रि का आधुनिक नाम – सतलुज।
- दृषद्वती का आधुनिक नाम – घग्घर।
- कुभा का आधुनिक नाम – काबुल।
- प्रेम विवाह का वैदिक नाम – गान्धर्व विवाह।
- सबसे श्रेष्ठ विवाह – ब्रह्म विवाह।
- बलपूर्वक विवाह – राक्षस विवाह।
- धन देकर विवाह – असुर विवाह।
- यज्ञोपवीत संस्कार – उपनयन।
- पहली बार अन्न ग्रहण – अन्नप्राशन।
- पहली शिक्षा का संस्कार – विद्यारम्भ।
- गुरुकुल से वापसी का संस्कार – समावर्तन।
बौद्ध धर्म (Buddhism) – एक पंक्ति में
गौतम बुद्ध के जीवन से संबंधित तथ्य
- बौद्ध धर्म के संस्थापक – गौतम बुद्ध थे।
- गौतम बुद्ध का जन्म – 563 ईसा पूर्व में हुआ।
- जन्म स्थान – लुम्बिनी (वर्तमान नेपाल)।
- पिता – शुद्धोधन, शाक्य गण के प्रमुख।
- माता – महामाया (माया देवी)।
- बचपन का नाम – सिद्धार्थ।
- पालन-पोषण – महाप्रजापति गौतमी ने किया।
- पत्नी – यशोधरा।
- पुत्र – राहुल।
- गृह त्याग (महाभिनिष्क्रमण) – 29 वर्ष की आयु में किया।
- ज्ञान प्राप्ति (निर्वाण) – बोधगया में निरंजना नदी के तट पर पीपल वृक्ष के नीचे हुई।
- प्रथम उपदेश – सारनाथ के मृगदाव (हिरण उद्यान) में दिया।
- बौद्ध संघ की प्रथम महिला सदस्य – महाप्रजापति गौतमी।
- महापरिनिर्वाण (मृत्यु) – 483 ईसा पूर्व में हुआ।
- मृत्यु स्थान – कुशीनगर (मल्ल गणराज्य की राजधानी)।
- उपदेशों की भाषा – पाली।
बुद्ध के जीवन से जुड़े प्रतीक
- जन्म – कमल (Lotus) एवं बैल (Bull)।
- महाभिनिष्क्रमण (गृह त्याग) – घोड़ा।
- निर्वाण (ज्ञान प्राप्ति) – पीपल/बोधि वृक्ष।
- धर्मचक्र प्रवर्तन (प्रथम उपदेश) – धर्मचक्र (Wheel)।
- महापरिनिर्वाण (मृत्यु) – स्तूप।
अष्टांगिक मार्ग (Eightfold Path)
- सम्यक दृष्टि – सही समझ एवं सही विचार।
- सम्यक संकल्प – सही उद्देश्य एवं संकल्प।
- सम्यक वाचा – सत्य एवं उचित वाणी।
- सम्यक कर्मान्त – अच्छे एवं नैतिक कर्म।
- सम्यक आजीविका – उचित एवं ईमानदार जीविका।
- सम्यक व्यायाम – सही प्रयास।
- सम्यक स्मृति – सही जागरूकता।
- सम्यक समाधि – सही एकाग्रता एवं ध्यान।
SSC/Railway Quick Revision
- बौद्ध धर्म के संस्थापक – गौतम बुद्ध।
- बुद्ध का जन्म – 563 ईसा पूर्व।
- जन्म स्थान – लुम्बिनी।
- बचपन का नाम – सिद्धार्थ।
- पिता – शुद्धोधन।
- माता – महामाया।
- पत्नी – यशोधरा।
- पुत्र – राहुल।
- ज्ञान प्राप्ति – बोधगया।
- प्रथम उपदेश – सारनाथ।
- मृत्यु स्थान – कुशीनगर।
- उपदेशों की भाषा – पाली।
- बोधि वृक्ष – ज्ञान प्राप्ति का प्रतीक।
- धर्मचक्र – प्रथम उपदेश का प्रतीक।
- घोड़ा – महाभिनिष्क्रमण का प्रतीक।
- स्तूप – महापरिनिर्वाण का प्रतीक।
- बौद्ध धर्म का मूल मार्ग – अष्टांगिक मार्ग।
बौद्ध संगीति (Buddhist Councils) – एक पंक्ति में
प्रथम बौद्ध संगीति
- वर्ष – 483 ईसा पूर्व।
- स्थान – राजगृह (राजगीर)।
- अध्यक्ष – महाकाश्यप।
- शासक – अजातशत्रु।
- उद्देश्य – बुद्ध के उपदेशों का संकलन।
द्वितीय बौद्ध संगीति
- वर्ष – 383 ईसा पूर्व।
- स्थान – वैशाली।
- अध्यक्ष – सब्बकामी।
- शासक – कालाशोक।
- विशेषता – संघ में मतभेद प्रारम्भ हुए।
तृतीय बौद्ध संगीति
- वर्ष – 250 ईसा पूर्व।
- स्थान – पाटलिपुत्र।
- अध्यक्ष – मोग्गलिपुत्त तिस्स।
- शासक – अशोक।
- विशेषता – बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु मिशन भेजे गए।
चतुर्थ बौद्ध संगीति
- वर्ष – प्रथम शताब्दी ईस्वी।
- स्थान – कुंडलवन (कश्मीर)।
- अध्यक्ष – वसुमित्र।
- उपाध्यक्ष – अश्वघोष।
- शासक – कनिष्क।
- विशेषता – महायान सम्प्रदाय को बढ़ावा मिला।
बौद्ध धर्म के सिद्धांत – एक पंक्ति में
- कर्मवाद में विश्वास – बौद्ध धर्म कर्म के सिद्धांत को मानता है।
- मोक्ष/निर्वाण में विश्वास – दुखों से मुक्ति को लक्ष्य मानता है।
- वेदों का विरोध – वेदों की सर्वोच्चता को स्वीकार नहीं करता।
- वैदिक कर्मकाण्डों का विरोध – यज्ञ एवं बलि प्रथा का विरोध करता है।
- ईश्वर के अस्तित्व पर जोर नहीं – सृष्टिकर्ता ईश्वर की अवधारणा को महत्व नहीं देता।
- आत्मा के स्थायी अस्तित्व को नहीं मानता – अनात्मवाद का सिद्धांत देता है।
त्रिपिटक (Tripitaka) – एक पंक्ति में
सुत्त पिटक
- संकलक – आनंद।
- विषय – बुद्ध के उपदेशों का संग्रह।
विनय पिटक
- संकलक – उपाली।
- विषय – भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों के नियम।
अभिधम्म पिटक
- संकलक – मोग्गलिपुत्त तिस्स।
- विषय – बौद्ध दर्शन एवं सिद्धांत।
- त्रिपिटक की भाषा – पाली।
बौद्ध धर्म की त्रिरत्न (Three Jewels)
- बुद्ध – ज्ञान प्राप्त व्यक्ति।
- धम्म (धर्म) – बुद्ध के उपदेश।
- संघ – भिक्षुओं का समुदाय।
बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य (Four Noble Truths)
- दुःख – जीवन दुःखमय है।
- दुःख समुदय – तृष्णा दुःख का कारण है।
- दुःख निरोध – तृष्णा का अंत दुःख का अंत है।
- दुःख निरोधगामिनी प्रतिपदा – अष्टांगिक मार्ग से दुःख समाप्त होता है।
बौद्ध धर्म का विभाजन
हीनयान (Theravada)
- उत्पत्ति – द्वितीय बौद्ध संगीति के बाद।
- विशेषता – बुद्ध को महापुरुष मानता है।
- भाषा – पाली।
- प्रमुख क्षेत्र – श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड।
महायान
- उत्पत्ति – चतुर्थ बौद्ध संगीति के बाद।
- विशेषता – बुद्ध को ईश्वर समान मानता है।
- भाषा – संस्कृत।
- प्रमुख क्षेत्र – चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत।
SSC/Railway Quick Revision
- प्रथम बौद्ध संगीति – राजगृह, अजातशत्रु।
- द्वितीय बौद्ध संगीति – वैशाली, कालाशोक।
- तृतीय बौद्ध संगीति – पाटलिपुत्र, अशोक।
- चतुर्थ बौद्ध संगीति – कश्मीर, कनिष्क।
- त्रिपिटक की भाषा – पाली।
- विनय पिटक के संकलक – उपाली।
- सुत्त पिटक के संकलक – आनंद।
- अभिधम्म पिटक के संकलक – मोग्गलिपुत्त तिस्स।
- बौद्ध धर्म के त्रिरत्न – बुद्ध, धम्म, संघ।
- चार आर्य सत्य – दुःख, दुःख समुदय, दुःख निरोध, दुःख निरोधगामिनी प्रतिपदा।
- महायान का संरक्षण – कनिष्क।
- बौद्ध धर्म का प्रचारक सम्राट – अशोक।
- महायान की भाषा – संस्कृत।
- हीनयान की भाषा – पाली।
बौद्ध काल के प्रमुख गणराज्य (Important Republics of Buddhist Era) – एक पंक्ति में
- वैशाली – लिच्छवि गणराज्य की राजधानी थी।
- मिथिला – विदेह गणराज्य की राजधानी थी।
- कुशीनगर – मल्ल गणराज्य की राजधानी थी।
- पावा – मल्ल गणराज्य का प्रमुख नगर था।
- रामग्राम – कोलिय गणराज्य की राजधानी थी।
- कपिलवस्तु – शाक्य गणराज्य की राजधानी थी।
- पिप्पलिवन – मोरिय गणराज्य की राजधानी थी।
- अलकप्पा – बुलि गणराज्य की राजधानी थी।
- केसपुत्त (केसपुत्र) – कालाम गणराज्य की राजधानी थी।
- सुंसुमारगिरि – भग्ग गणराज्य की राजधानी थी।
जैन धर्म के 24 तीर्थंकर एवं उनके प्रतीक – एक पंक्ति में
1 से 12 तीर्थंकर
- ऋषभदेव (आदिनाथ) – प्रतीक : बैल।
- अजितनाथ – प्रतीक : हाथी।
- संभवनाथ – प्रतीक : घोड़ा।
- अभिनन्दननाथ – प्रतीक : बंदर।
- सुमतिनाथ – प्रतीक : हंस।
- पद्मप्रभु – प्रतीक : कमल।
- सुपार्श्वनाथ – प्रतीक : स्वस्तिक।
- चन्द्रप्रभु – प्रतीक : चंद्रमा।
- पुष्पदंत (सुविधिनाथ) – प्रतीक : मगरमच्छ।
- शीतलनाथ – प्रतीक : श्रीवत्स।
- श्रेयांसनाथ – प्रतीक : गैंडा।
- वासुपूज्य – प्रतीक : भैंसा।
13 से 24 तीर्थंकर
- विमलनाथ – प्रतीक : वराह।
- अनंतनाथ – प्रतीक : बाज (Falcon)।
- धर्मनाथ – प्रतीक : वज्र।
- शांतिनाथ – प्रतीक : हिरण।
- कुंथुनाथ – प्रतीक : बकरा।
- अरहनाथ – प्रतीक : मछली।
- मल्लिनाथ – प्रतीक : कलश।
- मुनिसुव्रतनाथ – प्रतीक : कछुआ।
- नेमिनाथ – प्रतीक : शंख।
- अरिष्टनेमि – प्रतीक : शंख।
- पार्श्वनाथ – प्रतीक : सर्प।
- महावीर स्वामी – प्रतीक : सिंह।
SSC/Railway Quick Revision
- प्रथम जैन तीर्थंकर – ऋषभदेव (आदिनाथ)।
- 24वें जैन तीर्थंकर – महावीर स्वामी।
- पार्श्वनाथ का प्रतीक – सर्प।
- महावीर का प्रतीक – सिंह।
- ऋषभदेव का प्रतीक – बैल।
- अजितनाथ का प्रतीक – हाथी।
- नेमिनाथ का प्रतीक – शंख।
- मल्लिनाथ का प्रतीक – कलश।
- मुनिसुव्रतनाथ का प्रतीक – कछुआ।
- शांतिनाथ का प्रतीक – हिरण।
- सुपार्श्वनाथ का प्रतीक – स्वस्तिक।
- चन्द्रप्रभु का प्रतीक – चंद्रमा।
- पद्मप्रभु का प्रतीक – कमल।
- वासुपूज्य का प्रतीक – भैंसा।
- पुष्पदंत का प्रतीक – मगरमच्छ।
महावीर स्वामी – एक पंक्ति में परिचय
- 24वें जैन तीर्थंकर – महावीर स्वामी थे।
- जन्म वर्ष – 599 ईसा पूर्व।
- जन्म स्थान – कुंडग्राम (वैशाली)।
- पिता – सिद्धार्थ।
- माता – त्रिशला।
- वंश – ज्ञात्रिक (नाय) क्षत्रिय कुल।
- नाना – चेटक, वैशाली के राजा।
- बचपन का नाम – वर्धमान।
- पत्नी – यशोदा।
- पुत्री – प्रियदर्शना (अनोज्जा)।
- जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर – महावीर स्वामी थे।
- गृह त्याग – 30 वर्ष की आयु में किया।
- कठोर तपस्या – 12 वर्ष तक की।
- कैवल्य (ज्ञान) प्राप्ति – जृम्भिकग्राम के निकट ऋजुपालिका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे हुई।
- प्रथम उपदेश – पावा में दिया।
- उपदेशों की भाषा – प्राकृत (अर्धमागधी)।
- निर्वाण (मृत्यु) – 527 ईसा पूर्व में पावापुरी (बिहार) में हुआ।
SSC/Railway Quick Revision
- जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर – महावीर स्वामी।
- महावीर का जन्म – 599 ईसा पूर्व।
- महावीर का जन्म स्थान – कुंडग्राम (वैशाली)।
- महावीर के पिता – सिद्धार्थ।
- महावीर की माता – त्रिशला।
- महावीर का बचपन का नाम – वर्धमान।
- महावीर की पत्नी – यशोदा।
- महावीर की पुत्री – प्रियदर्शना।
- महावीर को कैवल्य ज्ञान कहाँ मिला? – ऋजुपालिका नदी के तट पर।
- महावीर की उपदेश भाषा – अर्धमागधी।
- महावीर का निर्वाण स्थल – पावापुरी।
- महावीर का प्रतीक चिन्ह – सिंह।
जैन धर्म के त्रिरत्न (Triratnas of Jainism) – एक पंक्ति में
- सम्यक दर्शन (Right Faith) – सत्य में सही आस्था रखना।
- सम्यक ज्ञान (Right Knowledge) – वस्तुओं का सही ज्ञान प्राप्त करना।
- सम्यक चरित्र (Right Conduct) – नैतिक एवं सदाचारी जीवन जीना।
जैन धर्म के पंच महाव्रत (Five Great Vows) – एक पंक्ति में
- सत्य – सदैव सत्य बोलना।
- अहिंसा – किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाना।
- अस्तेय – चोरी न करना।
- अपरिग्रह – आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना।
- ब्रह्मचर्य – इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना।
जैन धर्म के प्रमुख सम्प्रदाय (Jain Sects) – एक पंक्ति में
श्वेताम्बर सम्प्रदाय
- संस्थापक – स्थूलभद्र।
- विशेषता – सफेद वस्त्र धारण करते हैं।
- प्रमुख शाखाएँ – पूजेरा (देरावासी), ढूंढिया (स्थानकवासी), तेरापंथी, बीसपंथी एवं तोतापंथी।
दिगम्बर सम्प्रदाय
- संस्थापक – भद्रबाहु।
- विशेषता – नग्नता को त्याग और वैराग्य का प्रतीक मानते हैं।
- प्रमुख शाखाएँ – तेरापंथी, गुमानपंथी आदि।
जैन धर्म के सिद्धांत (Beliefs of Jainism) – एक पंक्ति में
- अपरिग्रह का सिद्धांत – वेदों की सर्वोच्चता को स्वीकार नहीं करता।
- ईश्वर में विश्वास नहीं – सृष्टिकर्ता ईश्वर की अवधारणा को नहीं मानता।
- आत्मा में विश्वास – प्रत्येक जीव में आत्मा के अस्तित्व को मानता है।
- कर्म सिद्धांत में विश्वास – कर्म के अनुसार फल मिलने को स्वीकार करता है।
जैन संगीति (Jain Councils) – एक पंक्ति में
प्रथम जैन संगीति
- वर्ष – 300 ईसा पूर्व।
- स्थान – पाटलिपुत्र।
- अध्यक्ष – स्थूलभद्र।
द्वितीय जैन संगीति
- वर्ष – 512 ईस्वी।
- स्थान – वल्लभी।
- अध्यक्ष – देवर्धिगणि क्षमाश्रमण।
भारतीय दर्शन के प्रमुख प्रवर्तक – एक पंक्ति में
- सांख्य दर्शन – कपिल मुनि।
- योग दर्शन – पतंजलि।
- न्याय दर्शन – गौतम।
- वैशेषिक दर्शन – कणाद।
- पूर्व मीमांसा दर्शन – जैमिनि।
- उत्तर मीमांसा (वेदांत) दर्शन – बादरायण।
SSC/Railway Quick Revision
- जैन धर्म के त्रिरत्न – सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र।
- जैन धर्म के पंच महाव्रत – सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य।
- श्वेताम्बर सम्प्रदाय के संस्थापक – स्थूलभद्र।
- दिगम्बर सम्प्रदाय के संस्थापक – भद्रबाहु।
- प्रथम जैन संगीति – पाटलिपुत्र, 300 ईसा पूर्व।
- द्वितीय जैन संगीति – वल्लभी, 512 ईस्वी।
- सांख्य दर्शन के प्रवर्तक – कपिल।
- योग दर्शन के प्रवर्तक – पतंजलि।
- न्याय दर्शन के प्रवर्तक – गौतम।
- वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक – कणाद।
- पूर्व मीमांसा के प्रवर्तक – जैमिनि।
- वेदांत दर्शन के प्रवर्तक – बादरायण।
महाजनपद काल (Mahajanapada Period) – एक पंक्ति में
- छठी शताब्दी ईसा पूर्व में छोटे-छोटे जनपद मिलकर महाजनपद बने।
- बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय में 16 महाजनपदों का उल्लेख मिलता है।
- जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में भी 16 महाजनपदों का वर्णन मिलता है।
16 महाजनपद – एक पंक्ति में
1. अंग (Anga)
- राजधानी – चम्पा (मुंगेर/भागलपुर क्षेत्र)।
2. अश्मक (Assaka)
- राजधानी – पोतलि (पैठन)।
3. अवन्ति (Avanti)
- उत्तरी राजधानी – उज्जयिनी।
- दक्षिणी राजधानी – महिष्मती।
4. गांधार (Gandhara)
- राजधानी – तक्षशिला।
5. कम्बोज (Kamboja)
- राजधानी – राजपुर/हाटक।
6. मगध (Magadha)
- राजधानी – राजगृह।
7. मत्स्य (Matsya)
- राजधानी – विराटनगर।
8. वज्जि (Vrijji)
- राजधानी – वैशाली।
9. चेदि (Chedi)
- राजधानी – सुक्तिमती।
10. काशी (Kashi)
- राजधानी – वाराणसी।
11. कोशल (Kosala)
- राजधानी – श्रावस्ती।
12. कुरु (Kuru)
- राजधानी – इन्द्रप्रस्थ।
13. मल्ल (Malla)
- राजधानी – कुशीनगर।
14. पांचाल (Panchala)
- राजधानी – अहिच्छत्र।
15. शूरसेन (Surasena)
- राजधानी – मथुरा।
16. वत्स (Vatsa)
- राजधानी – कौशाम्बी।
जैन धर्म – त्वरित पुनरावृत्ति (Quick Revision)
- जैन धर्म ईश्वर को सृष्टिकर्ता नहीं मानता।
- जैन धर्म आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करता है।
- जैन धर्म कर्म और पुनर्जन्म में विश्वास करता है।
- वेदों की सर्वोच्चता को स्वीकार नहीं करता।
जैन संगीति – एक पंक्ति में
- प्रथम जैन संगीति – 300 ईसा पूर्व, पाटलिपुत्र, अध्यक्ष स्थूलभद्र।
- द्वितीय जैन संगीति – 512 ईस्वी, वल्लभी, अध्यक्ष देवर्धिगणि।
भारतीय दर्शन एवं प्रवर्तक – एक पंक्ति में
- सांख्य दर्शन – कपिल।
- योग दर्शन – पतंजलि।
- न्याय दर्शन – गौतम।
- वैशेषिक दर्शन – कणाद।
- पूर्व मीमांसा – जैमिनि।
- उत्तर मीमांसा (वेदांत) – बादरायण।
SSC/Railway Quick Revision
- 16 महाजनपदों का उल्लेख – अंगुत्तर निकाय।
- मगध की राजधानी – राजगृह।
- वज्जि की राजधानी – वैशाली।
- काशी की राजधानी – वाराणसी।
- कोशल की राजधानी – श्रावस्ती।
- कुरु की राजधानी – इन्द्रप्रस्थ।
- मल्ल की राजधानी – कुशीनगर।
- पांचाल की राजधानी – अहिच्छत्र।
- शूरसेन की राजधानी – मथुरा।
- वत्स की राजधानी – कौशाम्बी।
- गांधार की राजधानी – तक्षशिला।
- अवन्ति की राजधानी – उज्जयिनी एवं महिष्मती।
- अश्मक की राजधानी – पोतलि।
- अंग की राजधानी – चम्पा।
मगध के राजवंश (Dynasties of Magadha) – एक पंक्ति में
- हर्यंक वंश – 544 ईसा पूर्व से 413 ईसा पूर्व तक शासन किया।
- शिशुनाग वंश – 412 ईसा पूर्व से 344 ईसा पूर्व तक शासन किया।
- नंद वंश – 344 ईसा पूर्व से 321 ईसा पूर्व तक शासन किया।
- मौर्य वंश – 321 ईसा पूर्व से 184 ईसा पूर्व तक शासन किया।
- शुंग वंश – 184 ईसा पूर्व से 75 ईसा पूर्व तक शासन किया।
- कण्व वंश – 73 ईसा पूर्व से 28 ईसा पूर्व तक शासन किया।
मौर्य साम्राज्य (Maurya Empire) – एक पंक्ति में
- मौर्य साम्राज्य के संस्थापक – चन्द्रगुप्त मौर्य थे।
- मौर्य वंश का अंतिम शासक – बृहद्रथ था।
- चन्द्रगुप्त मौर्य के पिता – मौर्य कुल से संबंधित थे।
- चन्द्रगुप्त मौर्य ने – 298 ईसा पूर्व में राजपाट त्याग दिया।
- चन्द्रगुप्त मौर्य – जैन आचार्य भद्रबाहु के शिष्य बने।
- चन्द्रगुप्त मौर्य – श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) चले गए।
- मौर्य शासकों में प्रमुख – चन्द्रगुप्त मौर्य, बिन्दुसार और अशोक थे।
मौर्य वंश के प्रमुख शासक
- चन्द्रगुप्त मौर्य – मौर्य साम्राज्य के संस्थापक।
- बिन्दुसार – चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र।
- अशोक – बिन्दुसार के पुत्र एवं महान मौर्य सम्राट।
- दशरथ – अशोक के उत्तराधिकारी।
- सम्प्रति – जैन धर्म के संरक्षक माने जाते हैं।
- शालिशुक – मौर्य वंश के उत्तरकालीन शासक।
- देववर्मन – मौर्य वंश के शासक।
- शतधन्वन – मौर्य वंश के शासक।
- बृहद्रथ – मौर्य वंश का अंतिम शासक।
सम्राट अशोक (Ashoka) – एक पंक्ति में
- अशोक का शासनकाल – 273 ईसा पूर्व से 232 ईसा पूर्व तक।
- माता – सुभद्रांगी।
- पिता – बिन्दुसार।
- अशोक की उपाधियाँ – देवानांप्रिय एवं प्रियदर्शी।
- राज्याभिषेक – 269 ईसा पूर्व में हुआ।
- अभिलेखों की भाषा – प्राकृत।
- अभिलेखों की लिपि – ब्राह्मी, खरोष्ठी, अरामाइक एवं यूनानी।
- 'अशोक' नाम का उल्लेख – मास्की, गुर्जरा और उदेगोलम अभिलेखों में मिलता है।
अशोक के अभिलेखों का वर्गीकरण
शिलालेख (Rock Edicts)
- 14 प्रमुख शिलालेख – अशोक के महत्वपूर्ण आदेशों का संग्रह।
- लघु शिलालेख – छोटे आकार के अभिलेख।
स्तंभलेख (Pillar Edicts)
- दिल्ली-टोपरा स्तंभलेख
- दिल्ली-मेरठ स्तंभलेख
- प्रयाग स्तंभलेख
- लौरिया नंदनगढ़ स्तंभलेख
- रामपुरवा स्तंभलेख
अशोक के 14 प्रमुख शिलालेख – एक पंक्ति में
प्रथम शिलालेख
- पशु बलि एवं पशु वध पर प्रतिबंध।
द्वितीय शिलालेख
- मनुष्यों और पशुओं के लिए चिकित्सा व्यवस्था तथा चोल, पाण्ड्य आदि राज्यों का उल्लेख।
तृतीय शिलालेख
- धर्म प्रचार हेतु अधिकारियों को निर्देश।
चतुर्थ शिलालेख
- धम्म के प्रसार का वर्णन।
पंचम शिलालेख
- धर्म महामात्रों की नियुक्ति।
षष्ठ शिलालेख
- प्रजा के प्रति सम्राट की नीति का वर्णन।
सप्तम शिलालेख
- सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता का संदेश।
अष्टम शिलालेख
- धर्मयात्रा का उल्लेख।
नवम शिलालेख
- अनावश्यक कर्मकाण्डों की आलोचना।
दशम शिलालेख
- यश एवं कीर्ति से अधिक धम्म को महत्व।
एकादश शिलालेख
- धम्म की व्याख्या।
द्वादश शिलालेख
- धार्मिक सहिष्णुता एवं सभी सम्प्रदायों के सम्मान पर बल।
त्रयोदश शिलालेख
- कलिंग युद्ध और उसके पश्चात अशोक के पश्चाताप का वर्णन।
चतुर्दश शिलालेख
- विभिन्न स्थानों पर अभिलेखों की स्थापना का उल्लेख।
SSC/Railway Quick Revision
- मौर्य साम्राज्य के संस्थापक – चन्द्रगुप्त मौर्य।
- मौर्य वंश का अंतिम शासक – बृहद्रथ।
- अशोक के पिता – बिन्दुसार।
- अशोक की उपाधि – देवानांप्रिय प्रियदर्शी।
- अशोक के अभिलेखों की प्रमुख भाषा – प्राकृत।
- अशोक के अभिलेखों की प्रमुख लिपि – ब्राह्मी।
- अशोक नाम का उल्लेख – मास्की अभिलेख।
- कलिंग युद्ध का वर्णन – 13वें शिलालेख में।
- धर्म महामात्रों का उल्लेख – 5वें शिलालेख में।
- धार्मिक सहिष्णुता – 12वें शिलालेख में।
- पशु वध निषेध – 1वें शिलालेख में।
- धर्मयात्रा का उल्लेख – 8वें शिलालेख में।
मौर्य प्रशासन की इकाइयाँ (Units of Mauryan Administration) – एक पंक्ति में
- साम्राज्य (Samrajya) – मौर्य प्रशासन की सर्वोच्च इकाई थी।
- प्रान्त (Prant) – कुमार/राजकुमार द्वारा शासित प्रशासनिक इकाई।
- मंडल (Mandala) – प्रदेश्टा के नियंत्रण में रहने वाली इकाई।
- आहार/विषय (Ahar/Vishaya) – विषयपति द्वारा संचालित जिला स्तर की इकाई।
- स्थानीय (Sthaniya) – लगभग 800 गाँवों का समूह।
- द्रोणमुख (Dronamukha) – लगभग 400 गाँवों का समूह।
- खार्वटिक (Kharvatika) – लगभग 200 गाँवों का समूह।
- संग्रहण (Sangrahana) – लगभग 10 गाँवों का समूह।
- ग्राम (Grama) – प्रशासन की सबसे छोटी इकाई।
मौर्यकाल के प्रमुख अधिकारी (Important Officials) – एक पंक्ति में
- कुप्याध्यक्ष – वनों का प्रबंधक।
- आकराध्यक्ष – खानों का अधीक्षक।
- सीताध्यक्ष – कृषि विभाग का प्रमुख।
- लक्षणाध्यक्ष – टकसाल (मुद्रा निर्माण) का अधिकारी।
- विवीताध्यक्ष – चारागाह भूमि का अधिकारी।
- पौतवाध्यक्ष – बाट एवं माप का नियंत्रक।
- सूनाध्यक्ष – पशु वधशालाओं का नियंत्रक।
- पण्याध्यक्ष – व्यापार एवं वाणिज्य का अधीक्षक।
कौटिल्य के अनुसार 18 तीर्थ (महत्वपूर्ण पदाधिकारी) – एक पंक्ति में
1. मंत्री (Mantri)
- प्रधानमंत्री – राज्य का मुख्य सलाहकार।
2. युवराज (Yuvaraja)
- उत्तराधिकारी राजकुमार।
3. समाहर्ता (Samaharta)
- राजस्व संग्रह का प्रमुख अधिकारी।
4. सन्निधाता (Sannidhata)
- कोषाध्यक्ष (Treasurer)।
5. सेनापति (Senapati)
- सेना का प्रधान सेनानायक।
6. प्रदेश्टा (Pradeshta)
- मुख्य न्यायाधीश एवं प्रशासनिक अधिकारी।
7. व्यवहारिक (Vyavaharika)
- दीवानी न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश।
8. दण्डपाल (Dandapala)
- सैन्य संसाधनों एवं अनुशासन का अधिकारी।
9. अन्तपाल (Antapala)
- सीमा सुरक्षा अधिकारी।
10. कर्मान्तिक (Karmantika)
- उद्योग एवं खानों का प्रमुख।
11. दुर्गपाल (Durgapala)
- किलों का रक्षक।
12. प्रशास्ता (Prashasta)
- राजकीय अभिलेख एवं दस्तावेजों का प्रमुख।
13. दौवारिक (Dauvarika)
- राजमहल के द्वारों का अधिकारी।
14. अन्तर्वंशिक (Antarvanshika)
- राजा के निजी अंगरक्षकों का प्रमुख।
15. आटविक (Atavika)
- वन विभाग का अधिकारी।
16. मंत्रिपरिषदाध्यक्ष (Mantriparishadadhyaksha)
- मंत्रिपरिषद का अध्यक्ष।
17. नायक (Nayaka)
- सेना का कमांडर।
अशोक के 14 प्रमुख शिलालेख – त्वरित पुनरावृत्ति
- प्रथम शिलालेख – पशु वध पर प्रतिबंध।
- द्वितीय शिलालेख – चिकित्सा व्यवस्था एवं चोल-पाण्ड्य का उल्लेख।
- तृतीय शिलालेख – ब्राह्मणों का सम्मान।
- चतुर्थ शिलालेख – धर्म प्रचार।
- पंचम शिलालेख – धर्म महामात्रों की नियुक्ति।
- षष्ठ शिलालेख – जनकल्याण।
- सप्तम शिलालेख – धार्मिक सहिष्णुता।
- अष्टम शिलालेख – धर्मयात्रा।
- नवम शिलालेख – कर्मकाण्डों की आलोचना।
- दशम शिलालेख – धम्म की महत्ता।
- एकादश शिलालेख – धम्म की व्याख्या।
- द्वादश शिलालेख – सभी धर्मों के प्रति सम्मान।
- त्रयोदश शिलालेख – कलिंग युद्ध एवं पश्चाताप।
- चतुर्दश शिलालेख – अभिलेखों का सार एवं प्रसार।
SSC/Railway Quick Revision
- मौर्य साम्राज्य की सबसे छोटी इकाई – ग्राम।
- 800 गाँवों का समूह – स्थानीय।
- 400 गाँवों का समूह – द्रोणमुख।
- 200 गाँवों का समूह – खार्वटिक।
- 10 गाँवों का समूह – संग्रहण।
- समाहर्ता – राजस्व संग्रह अधिकारी।
- सन्निधाता – कोषाध्यक्ष।
- सेनापति – सेना प्रमुख।
- अन्तपाल – सीमा रक्षक अधिकारी।
- दुर्गपाल – किलों का रक्षक।
- सीताध्यक्ष – कृषि विभाग का प्रमुख।
- पण्याध्यक्ष – व्यापार विभाग का प्रमुख।
- पौतवाध्यक्ष – बाट-माप नियंत्रक।
मौर्यकाल के प्रमुख कर (Important Taxes) – एक पंक्ति में
- पिण्डकर (Pindakara) – गाँवों के समूह पर लगाया जाने वाला कर।
- भाग (Bhaga) – भूमि उपज पर लगाया जाने वाला भू-राजस्व (Land Tax)।
- बलि (Bali) – धार्मिक कर या श्रद्धा-कर।
- प्रणय (Pranaya) – आपातकालीन कर (Emergency Tax)।
- हिरण्य (Hiranya) – नकद रूप में दिया जाने वाला कर।
- विश्टि (Vishti) – बेगार या अनिवार्य श्रम कर (Forced Labour Tax)।
- उदक-भाग (Udaka-Bhaga) – सिंचित भूमि पर लगाया जाने वाला जल कर (Water Tax)।
- परिघ (Parigha) – एकाधिकार (Monopoly) कर।
SSC/Railway Quick Revision
- भूमि कर – भाग।
- जल कर – उदक-भाग।
- नकद कर – हिरण्य।
- धार्मिक कर – बलि।
- आपातकालीन कर – प्रणय।
- बेगार/अनिवार्य श्रम कर – विश्टि।
- गाँवों के समूह पर कर – पिण्डकर।
- एकाधिकार कर – परिघ।
याद रखने की ट्रिक
"भाग-बलि-प्रणय-हिरण्य, विश्टि-उदक-परिघ-पिण्ड"
- भाग → भूमि कर
- बलि → धार्मिक कर
- प्रणय → आपातकालीन कर
- हिरण्य → नकद कर
- विश्टि → बेगार कर
- उदक-भाग → जल कर
- परिघ → एकाधिकार कर
- पिण्डकर → गाँव समूह कर
गुप्त काल (Gupta Period) – एक पंक्ति में
चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) के नवरत्न
- कालिदास – महान संस्कृत कवि एवं नाटककार।
- वररुचि – प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य।
- अमरसिंह – 'अमरकोश' के रचयिता।
- धन्वन्तरि – आयुर्वेद के विद्वान।
- क्षपणक – ज्योतिष एवं दर्शन के विद्वान।
- वेतालभट्ट – तंत्र एवं साहित्य के विद्वान।
- वराहमिहिर – प्रसिद्ध खगोलशास्त्री एवं ज्योतिषी।
- शंकु – वास्तु एवं भूगोल विशेषज्ञ।
- हरिषेण – कवि एवं प्रशस्ति लेखक।
कालिदास की प्रमुख रचनाएँ (Works of Kalidasa)
- अभिज्ञानशाकुन्तलम् – संस्कृत का प्रसिद्ध नाटक।
- विक्रमोर्वशीयम् – नाटक।
- मालविकाग्निमित्रम् – नाटक।
- कुमारसंभवम् – महाकाव्य।
- रघुवंशम् – महाकाव्य।
- मेघदूतम् – खंडकाव्य।
- ऋतुसंहार – ऋतुओं का काव्यात्मक वर्णन।
हर्षवर्धन (Harshavardhana) – एक पंक्ति में
- शासनकाल – 606 ईस्वी से 647 ईस्वी तक।
- पिता – प्रभाकरवर्धन।
- माता – यशोमती।
- उपाधि – शिलादित्य।
- राजधानी – थानेश्वर एवं बाद में कन्नौज।
- स्वयं लेखक थे – हर्षवर्धन ने कई ग्रंथ लिखे।
- प्रमुख रचनाएँ – प्रियदर्शिका, रत्नावली एवं नागानंद।
संगम काल (300 ईसा पूर्व – 300 ईस्वी)
- संगम काल में तीन प्रमुख राजवंश – चोल, चेर और पाण्ड्य थे।
- तीनों संगमों का संरक्षण – पाण्ड्य राजाओं ने किया।
- संगम सभाएँ – मदुरै क्षेत्र में आयोजित की जाती थीं।
प्रथम संगम
- स्थान – मदुरै।
- अध्यक्ष – अगस्त्य ऋषि।
- विशेषता – इसकी कोई रचना उपलब्ध नहीं है।
द्वितीय संगम
- स्थान – कपाटपुरम्।
- अध्यक्ष – तोलकाप्पियर।
- विशेषता – 'तोलकाप्पियम' की रचना इसी काल में हुई।
तृतीय संगम
- स्थान – उत्तर मदुरै।
- अध्यक्ष – नक्कीरर।
- विशेषता – अधिकांश संगम साहित्य उपलब्ध है।
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- विक्रमादित्य कौन थे? – चन्द्रगुप्त द्वितीय।
- नवरत्न किसके दरबार में थे? – चन्द्रगुप्त द्वितीय।
- अमरकोश के रचयिता – अमरसिंह।
- अभिज्ञानशाकुन्तलम् के लेखक – कालिदास।
- मेघदूतम् के लेखक – कालिदास।
- रघुवंशम् के लेखक – कालिदास।
- हर्षवर्धन की उपाधि – शिलादित्य।
- हर्षवर्धन की राजधानी – कन्नौज।
- प्रियदर्शिका के लेखक – हर्षवर्धन।
- संगम साहित्य की भाषा – तमिल।
- संगमों के संरक्षक – पाण्ड्य राजा।
- तोलकाप्पियम के रचयिता – तोलकाप्पियर।
- संगम काल के प्रमुख राजवंश – चोल, चेर, पाण्ड्य।
प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण अभिलेख – एक पंक्ति में
वैदिक एवं प्रारम्भिक अभिलेख
- बोगाज़कोई अभिलेख (14वीं शताब्दी ई.पू.) – एशिया माइनर (तुर्की) में मिला; इसमें इन्द्र, मित्र, वरुण एवं नासत्य का उल्लेख है।
- जूनागढ़ अभिलेख (रुद्रदामन) – संस्कृत का प्रथम एवं सबसे विस्तृत शिलालेख माना जाता है।
- बेसनगर (गरुड़ध्वज) अभिलेख – यूनानी राजदूत हेलियोडोरस द्वारा स्थापित; ब्राह्मी लिपि एवं प्राकृत भाषा में।
गुप्तकाल एवं उत्तरकालीन अभिलेख
- मंदसौर अभिलेख (532 ई.) – यशोधर्मन की उपलब्धियों का वर्णन करता है।
- बदामी अभिलेख (543 ई.) – कर्नाटक का प्रथम अभिलेख; चालुक्य शासक पुलकेशिन-I से संबंधित।
- ऐहोल अभिलेख – पुलकेशिन-II की विजयों का वर्णन; रचयिता रविकीर्ति।
- बिलसद अभिलेख (415-16 ई.) – कुमारगुप्त प्रथम का अभिलेख।
- प्रयाग स्तंभ लेख (गुप्तकाल) – गुप्त वंश का महत्वपूर्ण स्रोत।
- मंदसौर अभिलेख (मालवा) – कुमारगुप्त-II एवं बन्धुवर्मन का उल्लेख।
- करमदण्डा अभिलेख – शिव प्रतिमा की स्थापना का उल्लेख।
- मनकुवर अभिलेख (448 ई.) – बुद्धमित्र द्वारा स्थापित बुद्ध प्रतिमा का उल्लेख।
- सांची अभिलेख (450 ई.) – गुप्त संवत 131 का उल्लेख।
- हाथीगुम्फा अभिलेख – कलिंग नरेश खारवेल की उपलब्धियों का प्रमुख स्रोत।
- रबातक अभिलेख – कुषाण शासकों विशेषकर कनिष्क की जानकारी देता है।
- प्रयाग प्रशस्ति – समुद्रगुप्त की विजयों का वर्णन; रचयिता हरिषेण।
- उत्तिरमेरूर अभिलेख – चोलकालीन स्थानीय स्वशासन की जानकारी देता है।
- अयोध्या अभिलेख – पुष्यमित्र शुंग के राज्यपाल धनदेव का उल्लेख; अश्वमेध यज्ञ का प्रथम उल्लेख।
- सांची अभिलेख (412 ई.) – चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल का उल्लेख।
- मेहरौली लौह स्तंभ अभिलेख – चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य की उपलब्धियों का वर्णन।
गुप्तकालीन ताम्रपत्र एवं अन्य अभिलेख
- तुमैन अभिलेख (435 ई.) – कुमारगुप्त प्रथम को "अष्टम सूर्य" कहा गया।
- धनैदह ताम्रपत्र – कुमारगुप्त के प्रशासन का वर्णन।
- दामोदरपुर ताम्रपत्र – गुप्त प्रशासन एवं भूमि दान की जानकारी देता है।
- बैग्राम ताम्रपत्र – गोविन्द स्वामी मंदिर हेतु भूमि दान का उल्लेख।
- भितरी स्तंभ लेख – स्कन्दगुप्त की हूणों पर विजय का वर्णन।
- कहोम स्तंभ लेख – स्कन्दगुप्त काल का अभिलेख।
- सुपिया अभिलेख – स्कन्दगुप्त की वंशावली का उल्लेख।
- जूनागढ़ अभिलेख (स्कन्दगुप्त) – सुदर्शन झील की मरम्मत का वर्णन।
- इन्दौर ताम्रपत्र – सूर्य मंदिर हेतु तेलियों के दान का उल्लेख।
- गढ़वा अभिलेख – गुप्त संवत 148 (467 ई.) का उल्लेख।
- बाँसखेड़ा अभिलेख – हर्षवर्धन की विजय एवं प्रशासन की जानकारी देता है।
- माहुबन ताम्रपत्र – हर्षकालीन प्रशासन एवं भूमि दान का उल्लेख।
- महाकूट अभिलेख – चालुक्य शासक कीर्तिवर्मन-I का उल्लेख।
- बिजौलिया अभिलेख – चौहान वंश के इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत।
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- प्रथम संस्कृत शिलालेख – जूनागढ़ अभिलेख (रुद्रदामन)।
- समुद्रगुप्त का अभिलेख – प्रयाग प्रशस्ति।
- प्रयाग प्रशस्ति के लेखक – हरिषेण।
- खारवेल का अभिलेख – हाथीगुम्फा।
- कनिष्क से संबंधित अभिलेख – रबातक अभिलेख।
- स्थानीय स्वशासन का प्रमाण – उत्तिरमेरूर अभिलेख।
- हूणों पर विजय का वर्णन – भितरी स्तंभ लेख।
- चन्द्रगुप्त द्वितीय का अभिलेख – मेहरौली लौह स्तंभ लेख।
- अश्वमेध यज्ञ का उल्लेख – अयोध्या अभिलेख।
- सुदर्शन झील की मरम्मत – जूनागढ़ अभिलेख (स्कन्दगुप्त)।
- कुमारगुप्त का अभिलेख – बिलसद अभिलेख।
- पुलकेशिन-II का अभिलेख – ऐहोल अभिलेख।
- यशोधर्मन का अभिलेख – मंदसौर अभिलेख।
- हर्षवर्धन का अभिलेख – बाँसखेड़ा अभिलेख।
प्राचीन भारत की स्थापत्य कला (Architecture of Ancient India) – एक पंक्ति में
सिंधु सभ्यता की प्रमुख मूर्तियाँ
- दाढ़ी वाले पुरोहित की मूर्ति – मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई।
- कांस्य नर्तकी (Bronze Dancer) – मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई।
- कांस्य नर्तकी का निर्माण – 'लॉस्ट वैक्स तकनीक' (Lost Wax Technique) से किया गया।
- मातृदेवी (Mother Goddess) की मूर्ति – बेलन घाटी के लोहंडा नाला (उत्तर प्रदेश) से प्राप्त हुई।
मौर्योत्तर काल की तीन प्रमुख मूर्तिकला शैलियाँ
1. गांधार शैली (Gandhara Style)
- निर्माण सामग्री – भूरे एवं धूसर पत्थर।
- विकास क्षेत्र – उत्तर-पश्चिम भारत।
- प्रभाव – यूनानी (ग्रीक) कला का प्रभाव।
- विशेषता – बुद्ध की मूर्तियों में घुंघराले बाल, गहरी आँखें एवं वस्त्रों की स्पष्ट सिलवटें।
- अन्य नाम – ग्रीको-बौद्ध कला।
2. मथुरा शैली (Mathura Style)
- निर्माण सामग्री – लाल चित्तीदार बलुआ पत्थर।
- विकास क्षेत्र – मथुरा, सोख एवं कंकाली टीला।
- प्रभाव – हिन्दू, जैन एवं बौद्ध धर्म।
- विशेषता – बुद्ध को स्वस्थ एवं बलिष्ठ शरीर के साथ दर्शाया गया।
- बाहरी प्रभाव – लगभग नहीं।
3. अमरावती शैली (Amaravati Style)
- निर्माण सामग्री – सफेद संगमरमर।
- विकास क्षेत्र – अमरावती एवं नागार्जुनकोंडा।
- प्रभाव – मुख्यतः बौद्ध धर्म।
- विशेषता – जातक कथाओं एवं बुद्ध के जीवन प्रसंगों का चित्रण।
- बाहरी प्रभाव – पूर्णतः भारतीय शैली।
मौर्यकालीन मूर्तिकला (Mauryan Sculpture)
- यक्ष मूर्ति – परखम (मथुरा) से प्राप्त हुई।
- यक्षी मूर्ति – लगभग 7 फीट ऊँची थी।
- यक्षी मूर्ति का प्रमुख उदाहरण – दीदारगंज यक्षी (पटना)।
- बेसनगर की मूर्ति – हाथी दाँत (Ivory) से निर्मित।
- बुलंदीबाग एवं कुम्हरार – लकड़ी के अवशेष प्राप्त हुए।
- बेसनगर की मूर्तियाँ – चौथी शताब्दी ईस्वी की मानी जाती हैं।
अशोक स्तंभ की विशेषताएँ
- एक ही पत्थर से निर्मित।
- अत्यंत चमकदार पॉलिशयुक्त।
- स्वतंत्र रूप से खड़े किए गए।
- शीर्ष पर पशु आकृतियाँ निर्मित थीं।
- स्तंभ गोलाकार एवं चिकने थे।
- ऊपर की ओर धीरे-धीरे पतले होते जाते थे।
मौर्यकालीन विहार गुफाएँ (Mauryan Vihara Caves)
| गुफा | समकालीन शासक | पहाड़ी |
|---|---|---|
| सुदामा | अशोक | बराबर पहाड़ियाँ |
| कर्ण चौपड़ | अशोक | बराबर पहाड़ियाँ |
| विश्व झोपड़ी | अशोक | बराबर पहाड़ियाँ |
| लोमस ऋषि | अशोक | बराबर पहाड़ियाँ |
| गोपिका | दशरथ | नागार्जुनी पहाड़ियाँ |
| वपिया-का-कुभा | दशरथ | नागार्जुनी पहाड़ियाँ |
| वडथिका-का-कुभा | दशरथ | नागार्जुनी पहाड़ियाँ |
| सीतामढ़ी | किसी पहाड़ी पर नहीं |
SSC/Railway Quick Revision
- ग्रीको-बौद्ध कला – गांधार शैली।
- लाल बलुआ पत्थर – मथुरा शैली।
- सफेद संगमरमर – अमरावती शैली।
- दीदारगंज यक्षी – पटना।
- कांस्य नर्तकी – मोहनजोदड़ो।
- लॉस्ट वैक्स तकनीक – कांस्य नर्तकी।
- एकाश्मक स्तंभ (Monolithic Pillar) – अशोक स्तंभ।
- लोमस ऋषि गुफा – बराबर पहाड़ियाँ।
- गोपिका गुफा – नागार्जुनी पहाड़ियाँ।
- गांधार शैली पर प्रभाव – यूनानी कला।
- मथुरा शैली की सामग्री – लाल चित्तीदार बलुआ पत्थर।
- अमरावती शैली की सामग्री – सफेद संगमरमर।
सातवाहन काल की स्थापत्य कला (Architecture of Satavahana Period) – एक पंक्ति में
प्रमुख स्तूप
- अमरावती स्तूप – गुंटूर (आंध्र प्रदेश) में स्थित; कर्नल मैकेंज़ी ने इसकी खोज की।
- नागार्जुनकोंडा स्तूप – कृष्णा नदी के दक्षिणी तट पर स्थित; लांगहर्स्ट ने 1926 ई. में उत्खनन कराया।
प्रमुख गुफाएँ
- भाजा गुफाएँ – पुणे (महाराष्ट्र); दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व की।
- अजंता गुफाएँ – औरंगाबाद (महाराष्ट्र); दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से संबंधित।
- कार्ले गुफाएँ – पुणे (भोरघाट पहाड़ी); पुलुमावी काल में निर्मित।
- कन्हेरी गुफाएँ – मुंबई (सालसेट द्वीप); कार्ले गुफाओं की शैली पर आधारित।
- विशेष तथ्य – इनमें से अधिकांश गुफाएँ बौद्ध चैत्य एवं विहार हैं।
गुप्तकालीन स्थापत्य कला (Architecture of Gupta Period)
प्रमुख मंदिर
- तिगवा विष्णु मंदिर – जबलपुर, मध्य प्रदेश।
- एरण विष्णु मंदिर – सागर, मध्य प्रदेश।
- नचना-कुठार पार्वती मंदिर – पन्ना, मध्य प्रदेश।
- भूमरा मंदिर – सतना, मध्य प्रदेश।
- देवगढ़ का दशावतार मंदिर – ललितपुर, उत्तर प्रदेश।
- भितरगाँव मंदिर – कानपुर, उत्तर प्रदेश।
प्रमुख स्तूप
- भरहुत स्तूप – सतना (मध्य प्रदेश); ईंटों से निर्मित।
- सांची स्तूप (स्तूप-3) – रायसेन (मध्य प्रदेश); सारिपुत्र एवं महा-मौद्गल्यायन के अवशेष सुरक्षित हैं।
मंदिर स्थापत्य की प्रमुख शैलियाँ
नागर शैली (Nagara Style)
- प्रचलन क्षेत्र – सम्पूर्ण उत्तर भारत।
- मंदिर का आधार – वर्गाकार।
- शिखर – मधुमक्खी के छत्ते (Beehive) जैसा।
- गर्भगृह – शिखर के नीचे स्थित।
- आमलक – शिखर के शीर्ष पर स्थित वृत्ताकार संरचना।
- द्वारपाल मूर्तियाँ – गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर।
द्रविड़ शैली (Dravida Style)
- प्रचलन क्षेत्र – दक्षिण भारत।
- विमान – मंदिर का ऊँचा पिरामिडाकार भाग।
- गोपुरम – विशाल प्रवेश द्वार।
- उत्पत्ति – छठी शताब्दी ईस्वी के आसपास।
वेसर शैली (Vesara Style)
- नागर एवं द्रविड़ शैली का मिश्रण।
- प्रचलन क्षेत्र – दक्कन क्षेत्र।
- मंडप एवं प्रवेश द्वार – अत्यंत अलंकृत।
होयसला शैली (Hoysala Style)
- निर्माण सामग्री – साबुन पत्थर (Soapstone)।
- विशेषता – अत्यंत सूक्ष्म नक्काशी।
विजयनगर शैली (Vijayanagara Style)
- मंदिर ऊँचे चबूतरे पर निर्मित होते थे।
- पिरामिडाकार गोपुरम इसकी प्रमुख विशेषता है।
- मंदिरों की दीवारों पर मूर्तिकला का उत्कृष्ट प्रदर्शन मिलता है।
- संगीत, नृत्य एवं नाटक के प्रदर्शन हेतु मंडप बनाए जाते थे।
नायक शैली (Nayaka Style)
- प्रसिद्धि – विशाल गोपुरमों के लिए।
- विशेषता – मंदिर परिसर का विस्तार एवं प्रदक्षिणा पथ का निर्माण।
पाल एवं सेन शैली (Pala-Sena Style)
- निर्माण सामग्री – काली बेसाल्ट एवं चिकनी मिट्टी।
- विशेषता – मूर्तिकला में उत्कृष्टता।
- धातु मूर्तियाँ – प्रसिद्ध।
- वास्तुकला – बाँस की झोपड़ियों से प्रेरित।
SSC/Railway Quick Revision
- अमरावती स्तूप – आंध्र प्रदेश।
- नागार्जुनकोंडा स्तूप – कृष्णा नदी तट।
- कार्ले गुफाएँ – महाराष्ट्र।
- कन्हेरी गुफाएँ – मुंबई।
- दशावतार मंदिर – देवगढ़।
- भितरगाँव मंदिर – कानपुर।
- नागर शैली – उत्तर भारत।
- द्रविड़ शैली – दक्षिण भारत।
- वेसर शैली – नागर + द्रविड़ मिश्रण।
- होयसला शैली – साबुन पत्थर।
- विजयनगर शैली – विशाल गोपुरम।
- नायक शैली – प्रदक्षिणा पथ।
- पाल-सेन शैली – काला बेसाल्ट पत्थर।
भारतीय इतिहास के प्रमुख राजवंश (Major Dynasties of Indian History) – एक पंक्ति में
- हर्यंक वंश – राजधानी : राजगृह | संस्थापक : बिम्बिसार।
- शिशुनाग वंश – राजधानी : गिरिव्रज (राजगृह) | संस्थापक : शिशुनाग।
- नंद वंश – राजधानी : पाटलिपुत्र | संस्थापक : महापद्मनंद।
- मौर्य वंश – राजधानी : पाटलिपुत्र | संस्थापक : चन्द्रगुप्त मौर्य।
- शुंग वंश – राजधानी : पाटलिपुत्र | संस्थापक : पुष्यमित्र शुंग।
- कण्व वंश – राजधानी : पाटलिपुत्र | संस्थापक : वसुदेव कण्व।
- गुप्त वंश – राजधानी : पाटलिपुत्र | संस्थापक : श्रीगुप्त।
- वर्धन वंश – राजधानी : थानेश्वर | संस्थापक : पुष्यभूति।
- चालुक्य (बादामी) – राजधानी : वातापी (बादामी) | संस्थापक : जयसिंह।
- चालुक्य (कल्याणी) – राजधानी : मान्यखेट | संस्थापक : तैलप-II।
- चोल वंश – राजधानी : तंजावुर | संस्थापक : विजयालय।
- सातवाहन वंश – राजधानी : प्रतिष्ठान (पैठन) | संस्थापक : सिमुक।
- चेरा वंश – राजधानी : वंजी | संस्थापक : वनवरम्बन।
- पल्लव वंश – राजधानी : कांची | संस्थापक : सिंहविष्णु।
- राष्ट्रकूट वंश – राजधानी : मान्यखेट | संस्थापक : दन्तिदुर्ग।
- काकतीय वंश – राजधानी : वारंगल | संस्थापक : काकतीय रुद्रदेव-I।
- गंग वंश – राजधानी : कल्याणपुर | संस्थापक : वीर गंग।
- गुर्जर-प्रतिहार वंश – राजधानी : भीनमाल | संस्थापक : नागभट्ट-I।
- पाल वंश – राजधानी : मुंगेर | संस्थापक : गोपाल।
- सेन वंश – राजधानी : नवद्वीप | संस्थापक : सामंत सेन।
आधुनिक भारत के प्रमुख युद्ध (Major Wars of Modern India) – एक पंक्ति में
प्लासी का युद्ध (Battle of Plassey)
- वर्ष – 1757 ई.
- स्थान – प्लासी (पश्चिम बंगाल)।
- युद्ध – सिराजुद्दौला बनाम रॉबर्ट क्लाइव।
- परिणाम – अंग्रेजों की विजय; भारत में ब्रिटिश सत्ता की नींव पड़ी।
वांडीवाश का युद्ध (Battle of Wandiwash)
- वर्ष – 1760 ई.
- स्थान – वांडीवाश (तमिलनाडु)।
- युद्ध – अंग्रेज बनाम फ्रांसीसी।
- परिणाम – भारत में फ्रांसीसी शक्ति का अंत।
बक्सर का युद्ध (Battle of Buxar)
- वर्ष – 1764 ई.
- स्थान – बक्सर (बिहार)।
- युद्ध – मीर कासिम + शुजाउद्दौला + शाह आलम-II बनाम अंग्रेज।
- परिणाम – अंग्रेजों की निर्णायक विजय।
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध
- वर्ष – 1767–69 ई.
- युद्ध – हैदर अली बनाम अंग्रेज।
- परिणाम – मद्रास की संधि।
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध
- वर्ष – 1780–84 ई.
- युद्ध – हैदर अली एवं टीपू सुल्तान बनाम अंग्रेज।
- परिणाम – मंगलौर की संधि।
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध
- वर्ष – 1790–92 ई.
- युद्ध – टीपू सुल्तान बनाम अंग्रेज।
- परिणाम – श्रीरंगपट्टनम की संधि।
चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध
- वर्ष – 1799 ई.
- युद्ध – टीपू सुल्तान बनाम अंग्रेज।
- परिणाम – टीपू सुल्तान की मृत्यु; मैसूर पर अंग्रेजों का अधिकार।
कलिंग युद्ध
- वर्ष – 261 ईसा पूर्व।
- युद्ध – अशोक बनाम कलिंग।
- परिणाम – अशोक की विजय; बाद में बौद्ध धर्म अपनाया।
हाइडेस्पीज़ का युद्ध (Battle of Hydaspes)
- वर्ष – 326 ईसा पूर्व।
- स्थान – झेलम नदी।
- युद्ध – सिकंदर बनाम राजा पोरस।
- परिणाम – सिकंदर की विजय, परन्तु पोरस की वीरता से प्रभावित हुआ।
SSC/Railway Quick Revision
- मौर्य वंश के संस्थापक – चन्द्रगुप्त मौर्य।
- गुप्त वंश के संस्थापक – श्रीगुप्त।
- पाल वंश के संस्थापक – गोपाल।
- चोल वंश के संस्थापक – विजयालय।
- राष्ट्रकूट वंश के संस्थापक – दन्तिदुर्ग।
- प्लासी का युद्ध – 1757।
- बक्सर का युद्ध – 1764।
- वांडीवाश का युद्ध – 1760।
- कलिंग युद्ध – 261 ईसा पूर्व।
- हाइडेस्पीज़ का युद्ध – 326 ईसा पूर्व।
- प्लासी में अंग्रेजों का सेनापति – रॉबर्ट क्लाइव।
- हाइडेस्पीज़ में भारतीय राजा – पोरस।
- कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म अपनाने वाला शासक – अशोक।